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Saturday, October 19, 2013



हू मै बस उनका ही साया,कितना सच्चा मैंने जीवनसाथी पाया,

ठंडी हवा सा सकून है उन के साथ,है हम महफूज़ उन के साथ,

कयामत तक है हमारा साथ,हर जनम मे  हम होगे साथ,

वो  गर हम से गए रूठ,सांसे भी जाएगी हमारी रूठ ,

प्यार इतना किसी से न पाया,हर गम अब तो दूर गया ,

मेरी  सांसो मे उनकी सांसे महकती है,

हर साँस उन का नाम जपती है,

नहीं हु मै कुछ भी उनके बिन,माछी जैसे जल बिन,

………………. विद्या 


Thursday, September 19, 2013

swa;kranti

हर ओर तबाही  हुई ,क्यों  आज ये भारत पर आफत आई ,

हर और महंगाई की मार है,स्त्री का चीर हरण चारों  और है,

हर और युवा बेकार है,नौकरी की मारम -मर है,

गूंगी-बहरी सरकार है,

रूपया तो गिरा  सो गिरा ,मानवता भी खामोश है,

रॉकेट तो बहुत उड़ा लिए ,गरीब का पेट तो खाली  ही है,

सीमा पर क्यू हर कोई धाक जमाता है,?

काटे जिसने हमारे जवानों के धड़ है,

क्यों उन के लिए हम खामोश है,

कहाँ गया वो कारगिल वाला जज़्बा ,

क्या इतनी डरपोक हमारी  सरकार  है,??

सालो पहले लडे  जो फिरंगियों से,

आज क्रांति अपने आप से है,

जागो  और दिखा दो इस  दुनिया को,

खुशिया लाना हमारे हाथ मे  है. ………… 









Tuesday, September 17, 2013

natkhat.....bacpan

नटखट-बचपन 


याद है आज भी वो बचपन के नटखट भरे दिन,

नहीं रहते थे बिना खेले एक भी दिन,

बारिश के पानी मै हमारा भी जहाज ,गोते खाता था,

पेल-दूज खेल कर तो मन न भरा करता था,

क्रिकेट हो या घर-२ का खेल,

सब खेलो मे  हाथ आजमाते थे,

पूरी कॉलोनी को छुपम-छुपाई का घर बना लेते थे,

कब बजेगे घडी मे शाम के 5 ,

इसी का   करते रहते थे इंतजार,

हार  जाने पर भी न रोया करते थे,

बस दोस्तों के जीत की ही ख़ुशी मानते थे,

मस्ती का तो कोई नहीं अन्त  था,

बचपन का ज़माना ही कुछ और था.…. "विद्या"

Monday, August 26, 2013

बचपन-एक मासूम सी याद. 


बचपन का हर पल बहुत याद आता है,

हर वो बात जो आज भी दिल मे छुपी बैठी है,

यादो के झरोखों मे टकटकी लगे बैठी है,

क्या बात थी उस खट्टी-मीठी गोली मे ,

जो भाई से छीन कर खाई जाती थी,

क्या बात थी उस रोटी मे ,

जो सब के साथ चूर के खाई जाती थी,

हर शाम खेल ने निकल जाना,

पुरे मोहले मे उधम मचाना,

हर सुबह भाई का हाथ पकड़ स्कूल जाना,

स्कूल मे  होम वर्क के लिये दोस्तों से कॉपी मागना 

सर्दी होने पर स्कूल न जाना के लिए,बुखार का बहाना  बनाना,

टाइम निकल जाने पर,उठ खड़े होना,

माँ के साथ बाज़ार जाना,

और हर नए खिलोने की जिद करना,

पापा के आने पर दीदी से लड़ाई बंद कर पठने  बेठना ,

और हम है अच्छे बच्चे ये जताना ,

नींद खुलने से पहले माँ का चाय लाना,

सफाई के लिए बहन को बोल  देना,

छुट्टियों मई घंटो दोस्तों के साथ खेलना,

होली पर जम  कर गीले होना,

दिवाली मे रात भर जागना ,

हर त्यौहार बिना चिंता के मनाना ,

यही है सब के बचपन का ज़माना ,

"विद्या"




Wednesday, August 14, 2013

dulhan si azadi..........


आज़ादी -दुल्हन सी। …………. 

मना रहा है आज़ादी का दिवस आज देश,

क्या बदल लिया है आज़ादी ने अपना भेष?,

महगाई को बनाया अपना ताज़ ,

भ्रष्टाचार तो है उस का सरताज ,

बेरोज़गारी है आज़ादी का कंगन ,

कहा गया वो सोने का चमन,

निर्धनता हो गई उस की चुनरी,

फ़ौजी  की शहादत पर भी राजनीती बुनती,

चलो आज़ादी का वही रूप वापस हम सब मिल कर लाये,

सही अर्थ मै आज़ादी को मनाये,

आज़ादी को  दुल्हन सा सजाये,

आओ सच्चा आज़ादी दिवस मनाये,

देश की खुशिया वापस लाये,

"जय हिन्द "

विद्या 






Thursday, August 1, 2013

ichha........

इच्छा vs जिद्द 

           इच्छा और जिद्द  मे है बहुत महीन फासला,

इच्छा चाहती है सब की ख़ुशी,

तो जिद्द मागंती है केवल खुद की ख़ुशी,

इच्छा मे है एक मासूम सी सादगी,

तो जिद्द मे है एक तरह की दरिंदगी,

इच्छा कहती है काश मेरे  मन का हो,

जिद्द कहती है किसी भी हालत मे,बस उसी के मन का  हो,

यही है बस हमारा कहना,हर काम प्यार से करना,

जिद्द करके किसी रिश्ते को हासिल मत करना,

हर बात मे  जिद्द अच्छी  नहीं,

जिद्द से रिश्तो की डोर पक्की नहीं,

इच्छा मे  है कोशिश का साथ,आप के अपने होंगे आप  के साथ . 

"विद्या"


Saturday, July 27, 2013


"नादानी "


वो हमे नादां समझते है,हम भी अनजान हो जाते है,उनकी एक मुस्कराहट के लिए,

हमारी नादानी से उनके लबों पर आई हँसी,

तो इस नादानी को हमने ख़ुद के अन्दर ही समाई,

है,अनमोल हमारे लिए उनकी मासूम सी एक हँसी,

उसके लिए लाखो बार निभाई नादानी,

उन्हें लगता है हम कुछ नहीं समझते,

सच तो ये है मेरी "जान",

वो  हमारी नज़रो को नहीं समझते,

पढ़ लिया ग़र,कभी हमारे चेहरे को,

हमारी नादानी मे,खुद की नादानी तलाशोगे,

हम तो उनके  के प्यार के क़ायल है,

और वो  हमे  समझते पागल है :)

"विद्या"


NE:SHABAD........


"नि:शब्द"


आप की ये अनन्त सादगी ,प्यार भरा सुन्दर मन ,

आखों मे प्यार निश्छल,

आप के लिए ही है ,मेरा कल ,आज और कल,

आप की याद मे गुज़रता है हर पल

काश ,हम ज़रा भी आप जैसे हो पाते,

हर मोसम को हँसी से झेल पाते,

सभी की ज़िन्दगी मे साथी,आप जैसे नहीं आते,

आप जैसो के लिए ,लोग मन्नते है मागंते,

आप की हर बात मे शरारत,नज़रो से भी प्यार भरी शरारत,

मन मे ही मुस्कराते है,अच्छी लगती है शरारत,

आप की खूबियों के लिए कम है सारी,वर्णमाला,

बाकी नहीं है कोई शब्द,

हो गई हू मै "नि:शब्द"

मुझे अपने आप मे बसा लो,हो न पाए कोई गम का अहसास,

सरे जहां मे हो आप मेरे लिए सब से "खास"

"विद्या"

Wednesday, July 24, 2013

"कोई तो रोक लो "        

चारों और है कालीघटा छाई,आसमा मे अधियारी छाई,

क्यू लग रहा है भय,आज दुनिया की शामत आई,

जोर-२ से हवा है कह रही, कुदरत को तुम्ही ने  किया है नष्ट,कही ये कर ना दे

आज दुनिया को  ही नष्ट,

अभी भी है समय,मांग ले प्रकृति से छमा,

हे इंसा कर वृषो की रक्षा,पर्वत है तेरे पिता,और धरती है माँ सीता,

रोकना है ग़र नदियों के इस तूफ़ा को,पाक़ ही रख दरिया के पानी को,

रोक अपने सम्पन्ता के लालच को,और मत काट जगंल को,

जब होगा साँस लेना दुर्भर,कहाँ खोजेगा अपनी इस सम्पन्ता को,

हे इंसा संभल जा ,समझ कुदरत के इशारे को,

इंसा ही इंसा को बतलायेगा,नहीं कोई दूसरी दुनिया से आएगा,

है ये धरती ही अपनी माँ,माँ बिना हम सब को कौन सभाल पायेगा??????????




Tuesday, March 12, 2013

"umeed-kyu???????????"

               " उम्मीद-क्यू ? "

 क्यू  किसी  से उम्मीद रखता है इंसा , क्या हर उम्मीद पर खरा उतरता है इंसा ,


किसी से है कम उम्मीद  तो किसी से बहुत उम्मीद ,


क्यू इंसा  दुसरे को कैदी बना   देता है,


कम उम्मीद वाला बहुत कर दे तो हो ना भरोसा,बहुत वाला कम कर दे तो ,क्या करे इंसा? ,


ये भी तो हो सकता है,उम्मीद करे ही ना इंसा ,


क्यू  हम हर स्थति मे किसी विशेष से उम्मीद  लगा लेते है,


खरा न उतरने पर दिल को दगा दे बैठते है,


रिश्तो की ड़ोर को ना बाधो ,उम्मीद से,हर रिश्ते को आजाद छोड़ दो प्यार से,


ना हो कोई रिश्ते का आधार "उम्मीद"


प्यार मे कर गुज़रने की नहीं कोई सीमा,दिल मे ना रखो किसी के लिए कोई "उम्मीद"


"विद्या"

Monday, March 11, 2013

BACHPAN-MASUM BHARI YAAD

" मासूम सी याद "

बचपन का हर पल बहुत याद आता है ,हर वो बात जो आज भी दिल मे छुपी हुई है,

यादो के झरोखों मे  टकटकी लगाये हुई है,क्या बात थी उस खट्टी मीठी गोली मे ,

जो भाई से छीन कर खाई जाती थी,क्या बात थी उस रोटी मे ,

जो सब के साथ चूर के खाई जाती थी ,हर शाम खेलने निकल जाना,

पुरे मोहल्ले मे  बड़ी धूम मचाना,हर सुबह भाई का हाथ पकड़ स्कूल जाना,

स्कूल मे  होम वर्क के लिए दोस्तों की कॉपी मागना,

ठण्ड होने पर स्कूल ना जाने के लिए   बुखार का बहाना बनाना,टाइम निकल जाने पर खड़े हो जाना,

माँ के साथ बाहर जाने पर नए -२ खिलोनो की ज़िद्द करना ,
  
पापा के आने पर बहन से लड़ाई बंद कर,पढने बेढं जाना,

और हम है अच्छे बच्चे ये जताना,नींद खुलने से पहले माँ का चाय लाना,

गर्मी की छूटी मे घंटो दोस्तों के साथ खेलना,सफाई  के लिए बहन को बोल देना,

होली मे सब के टाइटल देना,जी भर कर गीले होना,और दिवाली मे रात भर जगाना,

यही है हमारे "बचपन" का ज़माना ,ज़िन्दगी भर मुश्किल है इसे भुला पाना,,,,,,,,,,,,,,,"विद्या"