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Tuesday, September 17, 2013

natkhat.....bacpan

नटखट-बचपन 


याद है आज भी वो बचपन के नटखट भरे दिन,

नहीं रहते थे बिना खेले एक भी दिन,

बारिश के पानी मै हमारा भी जहाज ,गोते खाता था,

पेल-दूज खेल कर तो मन न भरा करता था,

क्रिकेट हो या घर-२ का खेल,

सब खेलो मे  हाथ आजमाते थे,

पूरी कॉलोनी को छुपम-छुपाई का घर बना लेते थे,

कब बजेगे घडी मे शाम के 5 ,

इसी का   करते रहते थे इंतजार,

हार  जाने पर भी न रोया करते थे,

बस दोस्तों के जीत की ही ख़ुशी मानते थे,

मस्ती का तो कोई नहीं अन्त  था,

बचपन का ज़माना ही कुछ और था.…. "विद्या"

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