नटखट-बचपन
याद है आज भी वो बचपन के नटखट भरे दिन,
नहीं रहते थे बिना खेले एक भी दिन,
बारिश के पानी मै हमारा भी जहाज ,गोते खाता था,
पेल-दूज खेल कर तो मन न भरा करता था,
क्रिकेट हो या घर-२ का खेल,
सब खेलो मे हाथ आजमाते थे,
पूरी कॉलोनी को छुपम-छुपाई का घर बना लेते थे,
कब बजेगे घडी मे शाम के 5 ,
इसी का करते रहते थे इंतजार,
हार जाने पर भी न रोया करते थे,
बस दोस्तों के जीत की ही ख़ुशी मानते थे,
मस्ती का तो कोई नहीं अन्त था,
बचपन का ज़माना ही कुछ और था.…. "विद्या"

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