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Thursday, September 27, 2012

खुद से ऊपर उठ कर सोचो............



बालू रेत के जैसे ये जीवन तेरे हाथ से फिसलता चला जायेगा और तुझे पता भी नहीं चलेगा,
तुने पूरी ज़िन्दगी क्या किया .......... केवल खुद के लिए जिया,
खुद के लिए पैसा कमाया ,खुद के लिए नाम कमाया, 
तुझे भगवान  ने सब दिया,कभी सोचा है तुने दूसरो के लिए क्या किया,
कभी किसी भूखे को रोटी खिलाई ,कभी किसी जरूरतमंद की मदद की,
नही.........................करता भी कैसे, तुझे तो खुद के  लिए जीने मे ही आनद जो आ रहा था............
हे इन्सान अब तो खुद से ऊपर उठ जा और उन के लिए कुछ कर 
जिन्हें भगवन ने बना तो दिया है पर  किस्मत लिखनी ही भूल गया,
चल आज से ही एक प्रयोग कर शाम को किसी एक गरीब को खाना खिला देना
फिर देख तेरे को वो सुकून मिलेगा जिस की तलाश तु आज तक कर रहा था...............
सही मे  रात को अच्छी नींद आयेगी,वैसे सच कहू तो ये मैंने भी कुछ दिन पहले ही प्रयोग किया है,
ये एक दिन की आदत अपने आप ही आप के जीवन मे शामिल होती चली जाएगी,
तब आप को भी एहसास होगा की जिस भगवान ने मुझे सब कुछ दिया उस का मै शुक्रिया अदा कर सका...
और उन लोगो की मदद कर सका जिसे भगवन कुछ देना भूल गया था 
और आप उस ईश्वर के बन्दे बन कर उस की कमी को पूरी कर सके ............................
तो आज से ही कुछ ऐसा करे जो दूसरो की ख़ुशी के लिए हो ....................
खुद..................के लिए नहीं..............................."विद्या " 

Monday, September 24, 2012

अंतर ............................. क्यूँ ????????

मुझे ये सोच कर रोना आता हे, लड़की हुई तो उदास हो गए 

लड़का हुआ तो झूम उठे, खुशियों का कोई ठिकाना ही नहीं रहा, 

बेटी हुई तो रो रो कर बुरा हाल हे, जैसे जिंदगी से खुशियों का कोई नाता ही नहीं रहा, 

इन दोनों बातों में वाकई कितनी कडवी सच्चाई हैं, 

या खुदा की इन दोनों नेमतो में वाकई इतना अंतर हे 

या सिर्फ हम लोगों ने ही ये अंतर पैदा किया हे......................

मुझे कोई ये बता दे के एक औरत की ज़िंदगी में माँ  बनना ज़रूरी हैं 

या फिर एक बेटे की माँ ..................

मेरा तो दिल कहता हे कि माँ बनना ही एक पूरा एहसास हे ....................

बेटियाँ तो वो प्यारी मुस्कुराहट हे जो पुरे घर को अपने चंचल मन से भर देती हे, 

में तो उन लोगों पर तरस खाती हूँ जो बेटे और बेटी को अलग नज़र से देखते हे, 

क्यूँ आज भी ये समाज पुरानी रीतियों में जकड़ा हैं ...............

अगर सही तरह से सोचो कोई अंतर नहीं हैं ..............



बल्कि आपके दर्द को जो अपना समझे वो बेटी हैं ...............

दो दो घरों परिवारों को संभाले वो बेटी हैं ..................

पराई कहे जाने पर भी एक आवाज में दोड़ी आती हे वो बेटी हैं ......................

चार दिवारी के मकान को घर बनाये वो बेटी हैं .............................

अपने दर्द को छुपा कर खुशियाँ बांटे वो बेटी हैं ....................

बंद करो ये बेटा बेटी का नाटक ...................

सारी जिंदगी जो दूसरों के लिए जिये वो बेटी हैं ..................बेटी हैं ....................बेटी हैं ..........

फिर भी इतना अंतर ............................. क्यूँ ????????????????????? 

                                                                                                                                    "विद्या"

Sunday, September 23, 2012

बेटी की क्यूँ होती हे............"विदाई"

"VIDAI"

 

                   
क्यूँ होती हे बेटी की "विदाई", 

बचपन जिस घर में बिताया

हुई वहीँ से पराई ...........

बेटी की विदाई पर क्यूँ देते हे सब "बधाई" 

ईश्वर ने ये कैसे रीत बनायीं 

उस पल का दर्द एक बेटी ही जान पायी 

बेटो में तो सहनशीलता इसलिए ही नहीं बनायीं 

पराये घर को भी अपना बना कर उस में सारी जिंदगी बितायी 

उन लोगों की खुशियों को ही अपनी जिंदगी बनायीं 

पापा की डांट हर पल याद आयी 

माँ की छाया भी हुई परायी 

जाने बेटी की क्यूँ  होती हे "विदाई"


"विद्या "

          

दुआ............तेरे लिये!!!!!!!!!

दुआ............तेरे लिये!!!!!!!!!


तन्हाइयों  में रहना आसां नहीं, तेरी यादों की छाया जो हैं.......

तेरे बिना रह तो ले हम मगर तेरी परवाह जो हैं.......

तुझे भुला कर कहाँ जाये,इस दिल की हर धड़कन में ही तूहैं....... 

सुबह की ओस सी तेरी मुस्कान, दिल में सुकुन भर देती हैं....... 

तेरी यही अदा तो हमें भाती हैं, 

तेरी महक ही इन तन्हाइयों को मिटा देती हैं, 

जिंदगी में तुम्हें पा लिया तो और क्या चाहिये.........

बस सारी खुशियाँ रब तुम्हें दे दे .............



 यही दुआ..........तेरे लिए..........."विद्या"