मुझे ये सोच कर रोना आता हे, लड़की हुई तो उदास हो गए
लड़का हुआ तो झूम उठे, खुशियों का कोई ठिकाना ही नहीं रहा,
बेटी हुई तो रो रो कर बुरा हाल हे, जैसे जिंदगी से खुशियों का कोई नाता ही नहीं रहा,
इन दोनों बातों में वाकई कितनी कडवी सच्चाई हैं,
या खुदा की इन दोनों नेमतो में वाकई इतना अंतर हे
या सिर्फ हम लोगों ने ही ये अंतर पैदा किया हे......................
मुझे कोई ये बता दे के एक औरत की ज़िंदगी में माँ बनना ज़रूरी हैं
या फिर एक बेटे की माँ ..................
मेरा तो दिल कहता हे कि माँ बनना ही एक पूरा एहसास हे ....................
बेटियाँ तो वो प्यारी मुस्कुराहट हे जो पुरे घर को अपने चंचल मन से भर देती हे,
में तो उन लोगों पर तरस खाती हूँ जो बेटे और बेटी को अलग नज़र से देखते हे,
क्यूँ आज भी ये समाज पुरानी रीतियों में जकड़ा हैं ...............
अगर सही तरह से सोचो कोई अंतर नहीं हैं ..............

बल्कि आपके दर्द को जो अपना समझे वो बेटी हैं ...............
दो दो घरों परिवारों को संभाले वो बेटी हैं ..................
पराई कहे जाने पर भी एक आवाज में दोड़ी आती हे वो बेटी हैं ......................
चार दिवारी के मकान को घर बनाये वो बेटी हैं .............................
अपने दर्द को छुपा कर खुशियाँ बांटे वो बेटी हैं ....................
बंद करो ये बेटा बेटी का नाटक ...................
सारी जिंदगी जो दूसरों के लिए जिये वो बेटी हैं ..................बेटी हैं ....................बेटी हैं ..........
फिर भी इतना अंतर ............................. क्यूँ ?????????????????????
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